नारंगी बेचकर की गई बचत से बनवाया स्कूल

नारंगी बेचकर की गई बचत से बनवाया स्कूल


मैं कर्नाटक के मंगलुरु का रहने वाला हूँ और नारंगी बेचकर आजीविका चलाता हूँ | मैंने औपचारिक शिक्षा भी नहीं प्राप्त की थी | वर्ष 2000 तक तो मेरे गाँव में स्कूल तक नहीं था | बच्चे या तो घरेलू रोजगार में हाथ बटाते थे, या फिर जो शहर जाने में समर्थ थे, वे वहां जाकर पढाई करते थे | एक घटना ने मुझे गाँव में स्कूल खोलने को प्रेरित किया | दरसल रोजाना कि तरह मैं उस दिन भी एक टोकरे में नारंगी रख कर बेचने के लिए आवाज़ लगाते हुए चक्कर लगा रहा था | इस बीच एक विदेशी जोड़ा मेरे पास आया और उसने मुझसे नारंगी के दाम पूंछे | मैंने उनके इशारे और भाषा समझने के काफी प्रयास किये| असल में मैं तो तुलु और बेरी भाषा के अलावा किसी और भाषा में बात नहीं कर पाता था | वे लोग बिना नारंगी खरीदे मेरे पास से चले गए | इस घटना के बाद मुझे बहुत बुरा लगा, और मैंने महसूस किया कि कम से कम मेरे अपने गाँव के बच्चो को मेरी जैसी स्तिथि में नहीं होना चाहिए | उस दिन मुझे अहसास हुआ कि किस तरह से भाषा और संवाद जीवन में प्रगति करने में मदद कर सकते है, और लोगों को एक साथ ला सकते है |

मैंने गाँव में मौजूद मस्जिद समिति के सदस्यों से पूंछा कि क्या हम एक स्कूल शुरू कर सकते है | वे मेरी बात पर सहमत हो गए | हमने संयुक्त प्रयास से एक मदरसा शुरू किया और मुस्लिम समुदाय के कई बच्चे पड़ने आने लगे | यह जब सफलतापूर्वक चलने लगा, तो मेरे काम को पहचान मिली | लेकिन इतने से ही मैं सन्तुष्ट नहीं था | मैं गाँव कि उन लड़कियों के बारे में सोच रहा था, जो कक्षा पांच से आगे कि पढाई करना चाहती थी | साथ ही दोसरे समुदाय के बहुत सरे बच्चे थे, जो स्कूल जाना चाहते थे, पर जा नहीं पा रहे थे | इसके लिए कन्नड़ मधयम स्कूल शुरू करने का विचार हमेशा मेरे दिमाग में था | जब मैंने सरकारी अधिकारीयों से मदरसे में पड़ने की अनुमति मांगने के लिए संपर्क किया, तो अधिकारीयों ने मुझे बताया कि मदरसे में अरवी भाषा ही शिक्षा का एक मात्र मधयम है | मैं थोडा निराश हुआ, लेकिन मैंने अपनी रोज़ होने वाली आय से कुछ रूपए बचने शुरू कर दिए | साथ ही लोगों से स्कूल के लिए जमीन खरीदने और भवन निर्माण के लिए मदद मांगी | अब यह मदद का काम आसान हो गया है, पर 90 के दशक में ऐसा नहीं था | सरकारी अफसर ठीक से बात नहीं करते थे | वे मुझे पचास पैसे या एक रूपए के सिक्के दे कर भिकारियों जैसा बर्ताव करते थे | लेकिन मैंने खुद को कभी अपमानित महशूस नहीं किया | हालाकिं कई अधिकारी ऐसे भी मिले, जिन्होंने न सिर्फ कागजी कार्यवाही में मेरी मदद की, बल्कि स्कूल खोलने के लिए रूपए भी दिए | मेरा इरादा एक स्कूल बनाने का था और मैंने कदम पीछे नहीं खीचे | आख़िरकार मैंने गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय स्थापित किया, जिसमे सभी समुदाय के बच्चे पड़ सके | धीरे-धीरे जब छात्रों कि संख्या बढने लगी, तो पक्के भवन निर्माण के लिए क़र्ज़ लिया और अपनी बचत तथा लोगों के सहयोग से विद्यालय के लिए जमीन खरीदने में सफल रहा | वर्ष 2000 में कर्नाटक सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूल निर्माण की अनुमति दे दी | हमने आठ कक्षाओं और दो शौचालयों के साथ एक स्कूल का निर्माण किया | बाद में कई लोगों ने विद्यालय के लिए बेंच, डेस्क और अन्य आवश्यक सामग्री दान की | सामूहिक सहयोग से ही शिक्षको को वेतन भी दिया जाता है | अब स्कूल में 100 से अधिक बच्चे शिक्षा ले रहे है | मुझे ख़ुशी महसूस हो रही है क्यों कि मेरे इरादे हमेशा अच्छे रहे हैं |

यह इंटरव्यू है समाजसेवी "हरेकला हजब्बा" का जिन्होंने बिना कोई शिक्षा प्राप्त किये आने वाली पीडी के लिए प्राथमिक शिक्षा का अवसर प्रदान किया |


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