अफ्रीकी चीता
वर्ष १९६८ में देश में अंतिम बार सरगुजा (छत्तीसगढ़ ) के जंगलों में चीते को देखा गया |
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ( NTCA) द्वारा दायर एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रयोग के तौर पर सरकार को चीते को भारत में उचित स्थान पर रखने की अनुमति दे दी है | इससे पहले सर्वोच्च न्यायलय ने मई २०१२ में मध्यप्रदेश में कुनो पालपुर वन्यजीव अभ्यारण में विदेशी चीतों को लाने की योजना पर रोक लगा दी थी | इतिहास में पहली बार चीता पालने का साक्ष्य ११२९ इसवी में रचित संस्कृत ग्रन्थ मान्सौल्लास में मिलता है, जिसे अभिलाषितार्थ चिंतामणि भी कहते है | चीता अकेला जंगली जानवर है, जिसे भारत सरकार ने १९५२ में विलुप्तप्राय घोषित किया है | १९६८ में देश में अंतिम बार सरगुजा (छत्तीसगढ़) के जंगलों में चीते को देखा गया | अफ़्रीकी चीते के बारे में पहली बार १७७५ में जर्मन प्रकृतिवादी J C D वॉन श्रेबर ने अपनी पुस्तक द मैमल्स इलस्ट्रेटेड एज एन नेचर डिस्क्रिपसंस में प्रकाशित किया था | श्रेबर ने प्रजातियों का वर्णन एक नमूने के आधार पर किया था | देखने में समानता के कारण कुछ लोग तेंदुए को चीता समझने कि भूल कर बैठते है | अपनी खूबसूरत और आकर्षक खाल के लिए यह शुरू से ही शिकारिओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है | इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल शुची में "सुभेध" ( बल्नेरेवल) श्रेणी में रखा गया है | यह चीता मुख्यरूप से कालाहारी के निचले इलाको और रेगिस्तानो, ओकावांगो डेल्टा के सवाना और दक्षिण अफ्रीका में ट्रांसवाल क्षेत्र के घास के मैदानों में रहता है | वर्तमान में लगभग ६५००-७००० अफ़्रीकी चीते मौजूद है |


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